जाने कितनी अधूरी नज्में पड़ी हैं,
कुछ टेबल की दराज में और कुछ बिस्तर के सिरहाने मुड़ी-तुड़ी सी.
हर दफा मक्ते पे आके हाँफने लगती हूँ
और ये सोच के अधूरी छोड़ देती हूँ कि,
तुम से पूछ लूँगी अंजाम अपनी हर नज़्म का.
तुम मिले नहीं, अरसा हुआ,
मेरी नज्में अब मुरझाने लगी हैं,
एक अंजाम की उम्मीद में कब तलक बैठेंगी वो,
अब तो थक-हार के रूठ के जाने लगी हैं.
रोज़ नया ख्याल दिल में उफ़ान भरता है,
पेशानी से उतरने को मचलता है,
जानती हूँ बाकियों की तरह ये भी मंजिल तक ना पहुँच पाएगी,बस
नेपथ्य में ही रह जाएगी.
कब तलक बीते लम्हो के फसाने लिखूँगी ,कब तलक ,वो दर्द पुराने लिखूँगी
सोचती हूँ,
तुम आ जाओ तो कुछ करारे लफ्ज़ तुम से उधार ले लूँगी
अपने उन भीगे अशआरों को उतार फेकूँगी
तुम आ जाओ तो मेरे सिरहाने और दराजों को थोड़ा आराम मिले, और
मेरी हर नज़्म कोअंजाम मिले.
मक्ता-ग़ज़ल का आखिरी शेर,
नैपथ्य-बीच सफर में,
Wow...बीच भंवर में कब तक रहें आपके नज़्म। दुआ करते हैं वो आ जाए आपके बज़्म !
ReplyDeleteWow...बीच भंवर में कब तक रहें आपके नज़्म। दुआ करते हैं वो आ जाए आपके बज़्म !
ReplyDeleteWah preetiji.... Superb
ReplyDeleteWah preetiji.... Superb
ReplyDeleteतहे दिल से शुक्रिया
ReplyDeleteतुम आ जाओ तो मेरे सिरहाने और दराजों को थोड़ा आराम मिले, और
ReplyDeleteमेरी हर नज़्म कोअंजाम मिले....