Nazm
Tuesday, 7 February 2023
इम्यूनिटी और वैक्सीन
Monday, 27 January 2020
ज्वार
Monday, 16 December 2019
Wednesday, 13 March 2019
हर दफ़ा तुम्हारे जाने पर मैनें रचे विदाई गीत, मेरे आँसुओं से भी नहीं मिटी, मेरे अहसासात की रोशनाई, तुम्हारे हर बार जाने पर, मरा मेरे दिल का एक हिस्सा, जो कभी वापिस जिंदा न हो सका, तुम्हारे लौट आने पर भी, यूँ किश्तों में मेरे दिल का मरना, शायद अंजाम हो गया है मेरे दिल का, सुनो अब तुम्हारी बारी है, लिखो एक मर्सिया, और पढ़ दो एक फातिया मेरे नाम का। -प्रीति शिवरंजनी
Thursday, 15 December 2016
नज़्म
जाने कितनी अधूरी नज्में पड़ी हैं,
कुछ टेबल की दराज में और कुछ बिस्तर के सिरहाने मुड़ी-तुड़ी सी.
हर दफा मक्ते पे आके हाँफने लगती हूँ
और ये सोच के अधूरी छोड़ देती हूँ कि,
तुम से पूछ लूँगी अंजाम अपनी हर नज़्म का.
तुम मिले नहीं, अरसा हुआ,
मेरी नज्में अब मुरझाने लगी हैं,
एक अंजाम की उम्मीद में कब तलक बैठेंगी वो,
अब तो थक-हार के रूठ के जाने लगी हैं.
रोज़ नया ख्याल दिल में उफ़ान भरता है,
पेशानी से उतरने को मचलता है,
जानती हूँ बाकियों की तरह ये भी मंजिल तक ना पहुँच पाएगी,बस
नेपथ्य में ही रह जाएगी.
कब तलक बीते लम्हो के फसाने लिखूँगी ,कब तलक ,वो दर्द पुराने लिखूँगी
सोचती हूँ,
तुम आ जाओ तो कुछ करारे लफ्ज़ तुम से उधार ले लूँगी
अपने उन भीगे अशआरों को उतार फेकूँगी
तुम आ जाओ तो मेरे सिरहाने और दराजों को थोड़ा आराम मिले, और
मेरी हर नज़्म कोअंजाम मिले.
मक्ता-ग़ज़ल का आखिरी शेर,
नैपथ्य-बीच सफर में,