Tuesday, 7 February 2023

इम्यूनिटी और वैक्सीन

इम्यूनिटी और वैक्सीन

इरा ,
हैलो ,हैलो आवाज़ आ रही है?
जवाब दो इरा मेरी आवाज़ आ रही है?
 हां ,सिड तुम्हारी आवाज़ तो आ रही है पर ।
पर क्या इरा?
तुम नहीं आ रहे हो।यही कहने के लिए तो तुमने कॉल किया था ना।है ना?
इरा समझो ना……। हालात ही ऐसे बन पड़े हैं कि चाह कर भी नहीं आ पा रहा हूं। कोविड़ फिर से फैल रहा है और उड़ानों को लेकर गाइड लाइन भी बड़ी सख़्त हो गई हैं।तुम्हें पता है इरा नए शोध कहते हैं कि ये नया वैरिएंट भारतीयों पर उतना घातक नहीं है।हमारे डीएनए में कुछ ऐसा है जिसकी वजह से हमारी इम्यूनिटी बाकियों से काफ़ी बेहतर है।
जानती हूं सिड हमारी इम्यूनिटी स्ट्रॉन्ग है कोरोना उतना असर नहीं करेगा हम पर।
सिड तुम तो इम्यूनिटी पर ही शोध कर रहे हो ना। सुनो ना ,मेरे लिए भी ऐसी वैक्सीन ईजाद कर दो ना कि तुम्हारे ना आने की ख़बर का मुझ पे असर ही ना हो ।इतनी इम्यून हो जाऊं कि तुम्हारे आने ना आने से फ़र्क पड़ना ही बंद हो जाए।पूरे पूरे साल तुम्हारा इंतज़ार और अंत हासिल क्या ?फिर से नया साल नया इंतज़ार।और ऐसे पता नहीं कितने साल……….
सिड कहते हैं दर्द पुराना हो जाता है तो उसकी तासीर बदल जाती है फिर वो इतना जानलेवा नहीं रहता ।पर हर साल तुम्हारे आने की उम्मीद जब इंतज़ार में तब्दील हो जाती है तो इसकी तासीर को पहले से भी ज़्यादा सख़्त बना देती है। सिड साल दर साल ये बढ़ता दर्द अब बर्दाश्त नहीं होता।plz बना दो मेरे लिए ऐसी वैक्सीन कि इस दर्द का असर होना बंद हो जाए।कर दो ना मुझे इम्यून ……….
इरा …………..बस इतना ही कहूँगा, मैं कभी नहीं चाहूंगा
कि इस दर्द का असर कभी भी कम हो।इंसान बड़ा स्वार्थी होता है इरा।दर्द की शक्ल में सही पर मैं हर वक्त तुम में मौजूद तो रहता हूं।कुछ दर्द अच्छे हैं इरा 
ईश्वर तुम्हें कभी इतना इम्यून ना करे 
तथास्तु,तथास्तु तथास्तु……..(दोनो ना मिले तो क्या पर स्वर तो मिल रहे थे)
दोनों एक ही स्वर में फोन के दोनो छोर पर बुदबुदा रहे थे

Monday, 27 January 2020

ज्वार

उठते हैं 
नदी में भी ज्वार 
पर वो मुखर नहीं होते 
सागर की तरह 
वो नहीं तोड़ते
तट बन्धन 
अपनी उन्मादी
आकांक्षाओं का 
सीमित नृत्य 
सिर्फ नदी जानती है


प्रीति "शिवरंजनी"

Thursday, 15 December 2016

नज़्म

जाने कितनी अधूरी नज्में पड़ी हैं,
कुछ टेबल की दराज में और कुछ बिस्तर के सिरहाने मुड़ी-तुड़ी सी.

हर दफा मक्ते पे आके हाँफने लगती हूँ
और ये सोच के अधूरी छोड़ देती हूँ कि,
तुम से पूछ लूँगी अंजाम अपनी हर नज़्म का.

तुम मिले नहीं, अरसा हुआ,
मेरी नज्में अब मुरझाने लगी हैं,
एक अंजाम की उम्मीद में कब तलक बैठेंगी वो,
अब तो थक-हार के रूठ के जाने लगी हैं.

रोज़ नया ख्याल दिल में उफ़ान भरता है,
पेशानी से उतरने को मचलता है,
जानती हूँ बाकियों की तरह ये भी मंजिल तक ना पहुँच पाएगी,बस
नेपथ्य में ही रह जाएगी.
कब तलक बीते लम्हो के फसाने लिखूँगी ,कब तलक ,वो दर्द पुराने लिखूँगी
सोचती हूँ,
तुम आ जाओ  तो कुछ करारे लफ्ज़ तुम से उधार ले लूँगी
अपने उन भीगे अशआरों को उतार फेकूँगी
तुम आ जाओ तो  मेरे सिरहाने और दराजों को थोड़ा आराम मिले, और
मेरी हर नज़्म कोअंजाम मिले.

मक्ता-ग़ज़ल का आखिरी शेर,
नैपथ्य-बीच सफर में,

Saturday, 3 December 2016

नज़्म




मैं जानती हूँ ,तुम मुझे ढूंढते हो मेरी नज़्मों में,

मेरे निशां ढूँढते हो मेरे लिखे लफ़्ज़ों में,

अक्स मेरा तलाशते हो, मेरे रचे किरदारों में,

तलाशते हो अपनी कहानी मेरी जुबाँ में,

उलझ से जाते हो कभी-कभी मेरे बिछाये मायाजाल में,

तभी एक सिरा पकड़ के तैर के किनारे पे आ जाते हो,

पर नहीं छोड़ पाते हो मुझे ढूँढना।

मेरी तलाश में कही दूर तलक निकल आते हो,

फिर भी देखो ना ख़ाक ही पाते हो।

मैं अबूझ पहेली सी खड़ी तुम्हें दूर से देखती रहती हूँ,

यही सोचती, के काश तुम्हें समझा पाती।

मैं अपनी नज़्मों में सिर्फ तुमको ही लिखती हूँ,

लफ़्ज़ों की माला में तुमको ही पिरोती हूँ,

तुम्हारा अहसास ही साँस लेता है मेरी हर नज़्म में,

मुझे खोजते खोजते देखना, एक दिन तुम खुद को ही पा जाओगे।

झाँकोगे जब अपने भीतर तब मुझको ही पाओगे।