Monday, 27 January 2020

ज्वार

उठते हैं 
नदी में भी ज्वार 
पर वो मुखर नहीं होते 
सागर की तरह 
वो नहीं तोड़ते
तट बन्धन 
अपनी उन्मादी
आकांक्षाओं का 
सीमित नृत्य 
सिर्फ नदी जानती है


प्रीति "शिवरंजनी"