Thursday, 15 December 2016

नज़्म

जाने कितनी अधूरी नज्में पड़ी हैं,
कुछ टेबल की दराज में और कुछ बिस्तर के सिरहाने मुड़ी-तुड़ी सी.

हर दफा मक्ते पे आके हाँफने लगती हूँ
और ये सोच के अधूरी छोड़ देती हूँ कि,
तुम से पूछ लूँगी अंजाम अपनी हर नज़्म का.

तुम मिले नहीं, अरसा हुआ,
मेरी नज्में अब मुरझाने लगी हैं,
एक अंजाम की उम्मीद में कब तलक बैठेंगी वो,
अब तो थक-हार के रूठ के जाने लगी हैं.

रोज़ नया ख्याल दिल में उफ़ान भरता है,
पेशानी से उतरने को मचलता है,
जानती हूँ बाकियों की तरह ये भी मंजिल तक ना पहुँच पाएगी,बस
नेपथ्य में ही रह जाएगी.
कब तलक बीते लम्हो के फसाने लिखूँगी ,कब तलक ,वो दर्द पुराने लिखूँगी
सोचती हूँ,
तुम आ जाओ  तो कुछ करारे लफ्ज़ तुम से उधार ले लूँगी
अपने उन भीगे अशआरों को उतार फेकूँगी
तुम आ जाओ तो  मेरे सिरहाने और दराजों को थोड़ा आराम मिले, और
मेरी हर नज़्म कोअंजाम मिले.

मक्ता-ग़ज़ल का आखिरी शेर,
नैपथ्य-बीच सफर में,

Saturday, 3 December 2016

नज़्म




मैं जानती हूँ ,तुम मुझे ढूंढते हो मेरी नज़्मों में,

मेरे निशां ढूँढते हो मेरे लिखे लफ़्ज़ों में,

अक्स मेरा तलाशते हो, मेरे रचे किरदारों में,

तलाशते हो अपनी कहानी मेरी जुबाँ में,

उलझ से जाते हो कभी-कभी मेरे बिछाये मायाजाल में,

तभी एक सिरा पकड़ के तैर के किनारे पे आ जाते हो,

पर नहीं छोड़ पाते हो मुझे ढूँढना।

मेरी तलाश में कही दूर तलक निकल आते हो,

फिर भी देखो ना ख़ाक ही पाते हो।

मैं अबूझ पहेली सी खड़ी तुम्हें दूर से देखती रहती हूँ,

यही सोचती, के काश तुम्हें समझा पाती।

मैं अपनी नज़्मों में सिर्फ तुमको ही लिखती हूँ,

लफ़्ज़ों की माला में तुमको ही पिरोती हूँ,

तुम्हारा अहसास ही साँस लेता है मेरी हर नज़्म में,

मुझे खोजते खोजते देखना, एक दिन तुम खुद को ही पा जाओगे।

झाँकोगे जब अपने भीतर तब मुझको ही पाओगे।