Saturday, 3 December 2016

नज़्म




मैं जानती हूँ ,तुम मुझे ढूंढते हो मेरी नज़्मों में,

मेरे निशां ढूँढते हो मेरे लिखे लफ़्ज़ों में,

अक्स मेरा तलाशते हो, मेरे रचे किरदारों में,

तलाशते हो अपनी कहानी मेरी जुबाँ में,

उलझ से जाते हो कभी-कभी मेरे बिछाये मायाजाल में,

तभी एक सिरा पकड़ के तैर के किनारे पे आ जाते हो,

पर नहीं छोड़ पाते हो मुझे ढूँढना।

मेरी तलाश में कही दूर तलक निकल आते हो,

फिर भी देखो ना ख़ाक ही पाते हो।

मैं अबूझ पहेली सी खड़ी तुम्हें दूर से देखती रहती हूँ,

यही सोचती, के काश तुम्हें समझा पाती।

मैं अपनी नज़्मों में सिर्फ तुमको ही लिखती हूँ,

लफ़्ज़ों की माला में तुमको ही पिरोती हूँ,

तुम्हारा अहसास ही साँस लेता है मेरी हर नज़्म में,

मुझे खोजते खोजते देखना, एक दिन तुम खुद को ही पा जाओगे।

झाँकोगे जब अपने भीतर तब मुझको ही पाओगे।

8 comments:

  1. Very nice... तलाश और तराश जारी रखने का नाम ही जीवन है।

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  3. Chhayawad ki uttam rachna .. behtareen

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  4. Gum ki kali raato me mujhe tu tara si lagti he, dekhta hu tujha ko jab jab mujhe tu pyari si lagti he, taarif me teri kya kahu .....ki mujhko lafz nahi milte....har cheej me tu hi dikhati he..... tu jaan se pyari lagti he............

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  5. हौसला अफ़जाई के लिये शुक्रिया

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  6. सुन्दर प्रयास

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  7. आशा करता हूं इस नज्म प्रेमी को आपकी और नज़्में पढ़ने को मिलेंगी ।

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